कर्नाटक में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण को लेकर हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है। अदालत ने वर्ष 2022 के उस कानून के प्रावधानों को असंवैधानिक माना है, जिनसे राज्य में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा पार कर 56 प्रतिशत पहुंच गया था।
कर्नाटक SC-ST आरक्षण में क्या हुआ था बदलाव?
वर्ष 2022 में तत्कालीन राज्य सरकार ने अनुसूचित जाति का आरक्षण 15 से बढ़ाकर 17 प्रतिशत किया था। वहीं, अनुसूचित जनजाति का आरक्षण 3 से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया गया था।
इस बदलाव के बाद SC और ST का संयुक्त आरक्षण 24 प्रतिशत हो गया। अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का 32 प्रतिशत आरक्षण जोड़ने पर कुल कोटा 56 प्रतिशत पहुंच गया।
हाईकोर्ट ने क्यों उठाए सवाल?
अदालत ने आरक्षण की संवैधानिक सीमा और समानता के सिद्धांतों को महत्वपूर्ण माना। वर्ष 1992 के इंद्रा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सामान्य परिस्थितियों में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत निर्धारित की थी।
कर्नाटक SC-ST आरक्षण से जुड़े इस फैसले के बाद सरकारी
नौकरियों और शैक्षणिक प्रवेश प्रक्रियाओं पर असर पड़ सकता है।
हालांकि, पहले से हुई नियुक्तियों और प्रवेश पर प्रभाव संबंधित न्यायिक तथा सरकारी निर्देशों से स्पष्ट होगा।
राज्य सरकार के पास फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का कानूनी विकल्प मौजूद है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1: कर्नाटक में कुल आरक्षण कितना किया गया था?
उत्तर: वर्ष 2022 के कानून के बाद कुल आरक्षण 56 प्रतिशत पहुंच गया था।
प्रश्न 2: क्या SC-ST आरक्षण पूरी तरह समाप्त हो गया है?
उत्तर: नहीं। फैसला आरक्षण बढ़ाने वाले संबंधित कानूनी प्रावधानों से जुड़ा है।