लखनऊ: जातिगत जनगणना पर अखिलेश यादव ने केंद्र सरकार और भाजपा को खुली चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार चुनावों को पारदर्शी और व्यवस्थित तरीके से करा सकती है, तो जनगणना भी उसी तरह करानी चाहिए। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा शुरू हो गई है। एक सभा को संबोधित करते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि जातिगत जनगणना पर अखिलेश यादव की मांग सामाजिक न्याय से जुड़ी हुई है। उनका कहना है कि जब तक विभिन्न वर्गों की वास्तविक जनसंख्या का सही आंकड़ा सामने नहीं आएगा, तब तक योजनाओं और संसाधनों का न्यायसंगत वितरण संभव नहीं होगा।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जातिगत आंकड़ों को सार्वजनिक करने से बच रही है। अखिलेश यादव ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया में जिस तरह पारदर्शिता और जवाबदेही दिखाई जाती है, वही व्यवस्था जनगणना में भी लागू होनी चाहिए। इससे समाज के सभी वर्गों को उनकी वास्तविक भागीदारी और अधिकार मिल सकेंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले चुनावों से पहले जनगणना का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ सकता है। विपक्ष लगातार इस विषय को उठा रहा है, जबकि सरकार की ओर से अभी तक कोई अंतिम घोषणा नहीं की गई है। Sunil Sharma | The Morning Star के अनुसार, जातिगत जनगणना का मुद्दा सामाजिक न्याय, आरक्षण और विकास योजनाओं के वितरण से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ माना जा रहा है।
FAQ
Q1. जातिगत जनगणना पर अखिलेश यादव ने क्या कहा?
उन्होंने कहा कि सरकार चुनावों की तरह पारदर्शी तरीके से जातिगत जनगणना कराए।
Q2.जनगणना की मांग क्यों की जा रही है?
ताकि विभिन्न जातियों की वास्तविक जनसंख्या का आंकड़ा सामने आ सके और योजनाओं का लाभ सही तरीके से वितरित हो।
Q3. क्या जनगणना राजनीतिक मुद्दा बन सकती है?
हाँ, आगामी चुनावों में यह एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन सकता है।
