88 घंटे में पाकिस्तान ने मांगी शांति: जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को बताया ऐतिहासिक मोड़

ऑपरेशन सिंदूर: 88 घंटे में पाकिस्तान को झुकाया, सेना प्रमुख का बड़ा बयान

ऑपरेशन सिंदूर अब भारतीय सैन्य इतिहास में एक नई मिसाल बन चुका है। भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने इसे एक मील का पत्थर करार दिया है। उनका कहना है कि यह न केवल एक सटीक और समन्वित सैन्य कार्रवाई थी, बल्कि इसने भारत की आतंकवाद-विरोधी नीति को नई परिभाषा दी।”

केवल 88 घंटे में बदले हालात

जनरल द्विवेदी के अनुसार,ऑपरेशन सिंदूर की सफलता इस बात से मापी जा सकती है कि पाकिस्तान को केवल 88 घंटे के भीतर संघर्षविराम की मांग करनी पड़ी। यह भारत की सैन्य क्षमता, रणनीतिक योजना और त्वरित प्रतिक्रिया का स्पष्ट प्रमाण है। इस अभियान की योजना पहले से तैयार नहीं थी। यह इंटेलिजेंस-आधारित ऑपरेशन था जो अचानक आई स्थिति के आधार पर शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब देना था और यह भारतीय सशस्त्र बलों की क्षमताओं की पराकाष्ठा का उदाहरण बन गया।

पांचवीं पीढ़ी के युद्ध के लिए तैयार है भारत

सेना प्रमुख ने कहा कि भारतीय सशस्त्र बल अब पाँचवीं पीढ़ी के युद्ध के लिए तैयार हैं। इन युद्धों की प्रकृति पारंपरिक नहीं होगी। इसमें गैर-संपर्क युद्ध, रणनीतिक गति, और मनोवैज्ञानिक दबाव जैसे पहलू प्रमुख होंगे। इन पहलुओं को ध्यान में रखते हुए ही भारत ने ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों को अंजाम देने की क्षमता विकसित की है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सेना सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि तकनीकी श्रेष्ठता से भी अपनी लड़ाई लड़ रही है।

आधुनिक सैन्य ताकत के लिए आत्मनिर्भरता जरूरी

अपने चेन्नई दौरे के दौरान जनरल द्विवेदी ने कहा कि भारतीय सेना आधुनिक तकनीक के साथ-साथ पारंपरिक ताकत का भी संतुलन बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। इसी क्रम में उन्होंने आईआईटी मद्रास में एक अत्याधुनिक अनुसंधान केंद्र ‘अग्निशोध’ की औपचारिक शुरुआत की। यह अनुसंधान केंद्र विशेष रूप से उभरती तकनीकों जैसे एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग, साइबरसिक्योरिटी, क्वांटम कंप्यूटिंग, वायरलेस कम्युनिकेशन और ड्रोन टेक्नोलॉजी में सैन्यकर्मियों को प्रशिक्षण देगा।

अग्निशोध: रक्षा तकनीक में भारत का भविष्य

‘अग्निशोध’ केंद्र भारत के "स्वदेशीकरण से सशक्तीकरण" की नीति को मजबूती देता है। यह केंद्र सिर्फ रिसर्च नहीं करेगा, बल्कि उसे सीधे युद्धक्षेत्र में लागू करने लायक नवाचारों में बदलेगा। जनरल द्विवेदी ने यह भी बताया कि आईआईटी दिल्ली, आईआईटी कानपुर और आईआईएससी बेंगलुरु जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ सेना की साझेदारी से कई सफल प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं।

अकादमिक संस्थानों से मिल रही सैन्य शक्ति को नयी दिशा

भारतीय सेना ने हाल के वर्षों में कई बड़े शैक्षणिक संस्थानों के साथ गठजोड़ किया है, ताकि शैक्षणिक अनुसंधान और रक्षा तकनीक को जोड़ा जा सके। आईआईटी मद्रास के साथ किए जा रहे प्रोजेक्ट्स जैसे प्रोजेक्ट संभव’ और एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग में आर्मी बेस वर्कशॉप की भागीदारी इस दिशा में नए मील के पत्थर हैं। ये प्रयास दिखाते हैं कि भारतीय सेना तकनीकी नवाचार को अपनी रणनीतिक योजना में शामिल कर रही है।

भविष्य के सैन्य नेताओं को तैयार करने की पहल

सेना प्रमुख ने अपने चेन्नई दौरे में प्रशिक्षण अकादमी का भी दौरा किया। उन्होंने वहाँ के बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षण तकनीकों और आधुनिक चुनौतियों के अनुसार प्रशिक्षण की समीक्षा की। उन्होंने कहा कि भविष्य के सैन्य नेताओं को केवल शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक, तकनीकी और रणनीतिक रूप से भी तैयार किया जाना चाहिए। इस दिशा में अकादमी का योगदान महत्वपूर्ण है।

पूर्व सैनिकों का सम्मान और उनका निरंतर योगदान

अपने दौरे के दौरान उन्होंने पूर्व सैनिकों से भी संवाद किया और उनके योगदान को सराहा। चार विशिष्ट पूर्व सैनिकों को उन्होंने सम्मानित भी किया, यह दर्शाता है कि भारतीय सेना केवल वर्तमान ही नहीं, अपने अतीत और भविष्य के साथ भी गहराई से जुड़ी है।


“ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि भारत की बदलती रक्षा नीति, रणनीतिक सोच और आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम था। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी के नेतृत्व में भारतीय सेना न केवल युद्ध के पारंपरिक तरीके अपना रही है, बल्कि उभरती तकनीकों को भी अपनाकर “विकसित भारत 2047″ की नींव रख रही है। भारतीय सेना अब न सिर्फ हथियारों से, बल्कि तकनीक, आत्मनिर्भरता और रणनीति से भी लड़ाई जीतने को तैयार है।”

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