CBSE त्रि-भाषा नीति को लेकर देश में नई बहस शुरू हो गई है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, जिसमें कक्षा 9 के छात्रों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य करने की बात कही गई है। इस मामले में महाराष्ट्र की पूर्व मंत्री और शिक्षाविद् डॉ. फौजिया खान ने याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि CBSE त्रि-भाषा नीति के तहत दो भारतीय भाषाओं को अनिवार्य बनाने से कुछ राज्यों में भाषा थोपने की स्थिति पैदा हो सकती है। उनका दावा है कि दक्षिण भारत में हिंदी और उत्तर भारत में संस्कृत को बढ़ावा देने का दबाव बन सकता है। साथ ही, शिक्षकों की कमी के बावजूद इस नीति को लागू करना व्यावहारिक नहीं माना जा रहा है।
CBSE ने अपने 15 मई के सर्कुलर में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क 2023 का हवाला देते हुए यह व्यवस्था लागू करने की घोषणा की थी। बोर्ड का कहना है कि इसका उद्देश्य भारतीय भाषाओं और स्थानीय साहित्य को बढ़ावा देना है। अब इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का फैसला भविष्य की भाषा शिक्षा नीतियों को प्रभावित कर सकता है।यह मामला केवल भाषा शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि छात्रों की पसंद, राज्यों की भाषाई पहचान और शिक्षा नीति के संतुलन से भी जुड़ा हुआ है।
FAQ
प्रश्न: CBSE त्रि-भाषा नीति क्या है?
उत्तर: कक्षा 9 से तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य करने की नई व्यवस्था।
प्रश्न: याचिका किसने दायर की है?
उत्तर: डॉ. फौजिया खान ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।
प्रश्न: विवाद का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर: भाषा थोपने और शिक्षकों की कमी को लेकर चिंता जताई गई है।
