मेंस्ट्रुअल लीव पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में मेंस्ट्रुअल लीव को अनिवार्य बनाने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि यह मुद्दा संवेदनशील है और इस पर कानून बनाते समय सामाजिक और आर्थिक प्रभावों पर भी विचार करना जरूरी है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि अगर हर महीने महिलाओं को अनिवार्य रूप से मेंस्ट्रुअल लीव देने का नियम बना दिया जाता है, तो इससे रोजगार के अवसरों पर असर पड़ सकता है।

अदालत के अनुसार, मासिक धर्म महिलाओं की प्राकृतिक प्रक्रिया है और इसे नकारात्मक रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस विषय पर नीति बनाना सरकार का काम है। इसलिए अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए संबंधित प्राधिकरणों को इस विषय पर विचार करने की सलाह दी।

भारत में मेंस्ट्रुअल लीव को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। कुछ राज्यों और संस्थानों ने महिलाओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए मासिक धर्म के दौरान छुट्टी देने की व्यवस्था लागू की है। वहीं कई विशेषज्ञों का मानना है कि इससे कार्यस्थल पर महिलाओं के प्रति अलग दृष्टिकोण भी बन सकता है।

इस फैसले के बाद मेंस्ट्रुअल लीव का मुद्दा फिर से चर्चा में आ गया है। अब उम्मीद की जा रही है कि सरकार इस विषय पर संतुलित नीति बनाने पर विचार कर सकती है।

Jai Sharma | The Morning Star

FAQ

1. मेंस्ट्रुअल लीव क्या होती है?

मेंस्ट्रुअल लीव वह विशेष छुट्टी है जो महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान स्वास्थ्य कारणों से दी जाती है।

2. क्या भारत में मेंस्ट्रुअल लीव का कानून है?

भारत में अभी राष्ट्रीय स्तर पर मेंस्ट्रुअल लीव का कोई अनिवार्य कानून नहीं है, लेकिन कुछ राज्यों और संस्थानों में यह सुविधा दी जाती है।

3. सुप्रीम कोर्ट ने मेंस्ट्रुअल लीव याचिका क्यों खारिज की?

अदालत ने कहा कि मेंस्ट्रुअल लीव को अनिवार्य करने से कार्यस्थल पर महिलाओं के रोजगार और अवसरों पर असर पड़ सकता है।

4. किन राज्यों में मेंस्ट्रुअल लीव लागू है?

बिहार, केरल, ओडिशा और कर्नाटक जैसे कुछ राज्यों में मेंस्ट्रुअल लीव से जुड़े अलग-अलग नियम लागू किए गए हैं।

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